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Showing posts from May, 2017

एक गज़ल

हुई कुछ ख़ता ग़र तो हमको बता दो। न रहकर यूँ ख़ामोश हमको सज़ा दो।। कहो ज़िन्दगी से सितम कुछ करे कम। नहीं तो ख़ुदा मुझको पत्थर बना दो।। जले घर तुम्हारा न उस आग में ही। कभी नफरतों को नह...

एक ख़याल

याद की वो बदलियाँ हुईं हैं आज फिर सघन भागता है आज फिर अतीत की तरफ ये मन बचपने के खेल साथी मीत वो गली डगर ज़िन्दगी थी छाँव जैसी उम्र की न थी तपन

एक गज़ल

आपसे   राब्ता   भी  नहीं। आपसे हम खफ़ा भी नहीं।। हैं   नहीं    फासले    दरमियां। मिलने का सिलसिला भी नहीं।। इस  क़दर  दूर  वो  हैं   हुए। पहुँचे उन तक सदा भी नही।। निस्बतें अब नहीं दरमियां। पर हुए हम जुदा भी नहीं।। प्यार रह जाए बन इक घुटन। हर घड़ी  आजमा  भी  नहीं।। ऐब  सबके  गिनाते  फिरे। कोई इतना खरा भी नहीं।। बेवफ़ा जितनी  है  ज़िन्दगी। उतनी शायद कज़ा भी नही।। कोई वादा खुशी में न कर। क्रोध में  फैसला  भी  नहीं।। सोई   इंसानियत   दे   जगा। आता वो जलजला भी नहीं।।