एक गज़ल

हुई कुछ ख़ता ग़र तो हमको बता दो।
न रहकर यूँ ख़ामोश हमको सज़ा दो।।

कहो ज़िन्दगी से सितम कुछ करे कम।
नहीं तो ख़ुदा मुझको पत्थर बना दो।।

जले घर तुम्हारा न उस आग में ही।
कभी नफरतों को नहीं तुम हवा दो।।

वो चंदा फ़लक पर ही जल भुन उठेगा।
जो मुखड़े से तुम अपने परदा हटा दो।।

भरी रौशनी से रहे उनकी राहें।
मुझे उनकी राहों का दीपक बना दो।।

गए जो जहां से न लौटेंगे वापस।
भले राह में चाहे पलकें बिछा दो।।

न छोटा बड़ा कोई , इंसान हों सब।
चलो मिल के सब ऐसा मज़हब बना दो।।

Comments

  1. Zabardast message diye hai iss nazam ke madhayam see.... Verma ji.. U r rocking!!!

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    1. बहुत शुक्रिया बल्लभ भाई...

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